इस स्थिति के तीन मुख्य कारण हैं। एक तो रूस के पास दूरदर्शिता पर आधारित रणनैतिक चतुराई और संयम की नीति है। दूसरा कारण क्षेत्र में बड़ी समझदारी और गहरे अध्ययन के आधार पर बनाया जाने वाला एलायंस है विशेष रूप से ईरान, सीरिया और तुर्की के साथ रूसी एलायंस बहुत महत्वपूर्ण है। तीसरा कारण अमरीका मूर्खता और राजनैतिक पटल पर जारी उबाल है जो वाइट हाउस और कांग्रेस के बीच विवाद के चलते कई मामलों में टकराव के चरण तक जा पहुंचा है।
राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति पुतीन के लिए बहुत बड़ा गाड गिफ़्ट साबित हुए हैं। ट्रम्प अपनी ख़राब ज़बान और आक्रामक स्वभाव के कारण अपने शासन काल के तीन वर्षों में कुछ भी हासिल नहीं कर पाए। उनकी सारी नीतियां यहां तक कि अन्य देशों पर आए दिन आर्थिक प्रतिबंध लगाने की रणनीति व्यर्थ गईं ब्लकि पूरे इलाक़े में इन नीतियों का अमरीकी हितों पर विनाशकारी असर पड़ा है। अब अमरीका पर भरोसा ख़त्म हो गया है और अमरीकी घटक बुरी तरह परेशान हैं। इससे तो यही लगता है कि अमरीकी चुनावों में राष्ट्रपति पुतीन के हस्तक्षेप वाला विचार सही है हालांकि इसके साक्ष्य नहीं हैं।
राष्ट्रपति पुतीन ने रियाज़ और फिर अबू धाबी का दौरा किया। यह दोनों ही अमरीका के क़रीबी घटक हैं और अमरीका से सबसे अधिक हथियार ख़रीदने वाले देश हैं। दोनों देशों में व्यापारिक, सामरिक और तेल समझौतों पर हस्ताक्षर कर करके पुतीन के हाथ थक गए क्योंकि इनकी संख्या बहुत अधिक है। पुतीन बेहद ख़ुश होंगे और अपने क़रीबी घटक ईरान का आभार भी जता रहे होंगे। क्योंकि ईरान ने तथा इलाक़े के देशों जैसे यमन, इराक़ और लेबनान में उसके घटक संगठनों ने पूरे इलाक़े में स्ट्रैटेजिक बदलाव में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
ईरान और उसके घटकों ने तीन बहुत बड़ी कामयाबियां हासिल की हैं जिनके नतीजे में अमरीका को मध्यपूर्व के इलाक़े से निकलना पड़ा है और वह जगह रूस की सामरिक और राजनैतिक पैठ को मिल गई है।
- ईरान के बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों तथा ड्रोन विमानों ने जो उसने यमन में अपने घटक अंसारुल्लाह आंदोलन को दिए सामरिक और रक्षा क्षेत्र में अमरीकी दबदबे को चकनाचूर कर दिया। बल्कि शायद फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े में शक्ति का संतुलन ही बदल चुका है। इन मिसाइलों और ड्रोन विमानों ने सऊदी अरब की वायु रक्षा व्यवस्था में तैनात अमरीका द्वारा निर्मित सिस्टमों में बहुत बड़ी सेंध लगा दी जिसके नतीजे में सऊदी अरब से दुनिया के देशों को तेल की सप्लाई डगमगा गई। इसका सीधा फ़ायदा रूस के सामरिक उद्योग को पहुंचा और सऊदी अरब की तेल सप्लाई में कमी की भरपाई करने का मौक़ा रूस को मिल गया। फ़ार्स खाड़ी के अरब देश अब रूसी हथियारों की ओर भाग रहे हैं।
- सीरिया में ईरान की सैनिक भूमिका ने सीरिया को बड़ी मज़बूती दे दी यहां तक कि रूस के हस्तक्षेप से पहले भी ईरान की मदद के कारण सीरिया डटा रहा इसका नतीजा यह हुआ कि अमरीकी एजेंडा नाकाम हो गया।
- अमरीकी प्रतिबंधों के आगे ईरान का डटा रहना और अमरीकी शर्तों के आगे झुकने से तेहरान का इंकार। यही नहीं अमरीका तथा उसके घटकों के हितों पर फ़ार्स खाड़ी में हमला और अमरीकी प्रतिबंधों को नाकाम बनाते हुए हर दिन 2 मिलियन बैरल तेल का निर्यात। ईरान की एक बड़ी कामयाबी यह है कि उसने बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधार शुरू कर दिए हैं जिसका उद्देश्य देश की अर्थ व्यवस्था को तेल पर निर्भरता से निजात दिलाना है।
राष्ट्रपति पुतीन ने जो सफलताएं हासिल की हैं वह केवल व्यापारिक और सामरिक सौदों तक सीमित नहीं रहेंगी बल्कि शायद राजनैतिक समझौते तक जाएंगी जिनका फ़ायदा सीरिया में रूस के घटकों के हितों को होगा। सीरिया बहुत तेज़ी के साथ अपनी मज़बूत स्थिति की ओर लौट रहा है, हो सकता है कि बहुत जल्द वह अरब लीग में अपनी पुरानी भूमिका में लौट आए। इस बात के इशारे भी मिल रहे हैं कि सऊदी अरब भी बहुत जल्द इमारात की डगर पर चलकर अपने प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेजने वाला है ताकि सारे विवादस्पद मुद्दों को निपटा ले और यमन युद्ध भी समाप्त हो जाए। इनमें एक इशारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमारान ख़ान की रियाज़ यात्रा भी है।
किसको यह उम्मीद थी कि उत्तरी सीरिया में अमरीका अपनी हार मानेग और इसका नतीजा यह होगा कि उसकी घटक कुर्द फ़ोर्सेज़ रूस की मध्यस्थता से सीरियाई सरकार की चौखट पर वापस जाएंगी और तमाम अलगाववादी योजनाएं छोड़ देने का वादा करेंगी और अपने इलाक़ों के रास्ते सीरियाई सेना के लिए खोल देंगी और अमरीका से मिलने वाले सारे भारी हथियार सीरियाई सेना को सौंपने का वचन देंगी?
आज कुर्द दमिश्क़ लौटे हैं और पूरी संभावना है कि कल 1998 के तुर्की और सीरिया के अदना समझौते के तहत सीरिया और तुर्की के बीच सहयोग शुरू हो जाए। यह रूसी चतुराई है जो मध्यपूर्व में नया वर्ल्ड आर्डर तैयार कर रही है जिसमें अमरीका के लिए कोई जगह नहीं है।